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फ़िरोज़ शाह कोटला किला


फ़िरोज़ शाह कोटला किला (किला)

फ़िरोज़ शाह कोटला क़िला फ़िरोज़ शाह तुगलक द्वारा नई दिल्ली में बनाया गया था। इससे पहले, मौर्यों द्वारा निर्मित स्मारकों के अवशेष भी हैं और उनमें से एक अशोक स्तंभ है जिसे मौर्य राजा अशोक द्वारा तीसरी शताब्दी के दौरान बनाया गया था। यह स्तंभ फिरोज शाह द्वारा अंबाला में पोंग घाटी से लाया गया था और किले में स्थापित किया गया था।





भारत की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली बिना किसी संदेह के देश का दिल है। देश की राजधानी होने के कारण यहां देश के साथ ही विदेश के सैलानियों का आकर्षण होना भी आम बात है। भारतीय इतिहास और विरासत का बड़ा दौर देखा है दिल्ली ने। ऐसा ही वैभवशाली इतिहास समेटे हुए हुए है दिल्ली में स्थित फिरोज शाह कोटला का किला। कुतुब मीनार, लाल किला और हुमायूं के मकबरे जैसा ही दिल्ली का नगीना है कोटला का किला। आइए आज जानते हैं कि क्यों यहां एक ट्रिप तो बनती ही है...

किसने बनवाया ?

फिरोज शाह कोटला किला क्षेत्र को केवल कोटला के नाम से भी जाना जाता है। यह दिल्ली के सुल्तान फ़िरोज शाह तुगलक द्वारा निर्मित एक किला है। इस किले को बनाने के पीछे मुख्य कारण तुगलकाबाद में पानी की कमी थी और यही कारण था कि उस दौरा में मुगलों ने अपनी राजधानी को तुगलकाबाद से फिरोजाबाद स्थानांतरित करने का फैसला किया।

कोटला का किला तुगलक वंश की तीसरी पीढ़ी के शासन का प्रतीक बन गया। इस किले में स्थानीय लोग बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। इसका कारण है इस किले में प्रार्थना स्वीकार होने का विश्वास। मान्यता है कि स्वर्ग से जिन्न इस किले में आते हैं और लोगों की इच्छाओं को पूरा करते हैं। इसमें कितनी सच्चाई है कहा नहीं जा सकता लेकिन आस्था और विश्वास पर सवाल नहीं उठाए जा सकते। घूमने के लिहाज से यह किला एक अच्छी जगह है। इस किले के बाईं तरफ अशोक स्तंभ है और दाईं तरफ जामा मस्जिद


फ़िरोज़ शाह कोटला मेरी आँखों की जुबानी 


किलों में आपकी कितनी दिलचस्पी है? पर्सनली कहूं तो मेरी बिल्कुल भी नहीं है. किलों की बात करने पर निश्चित ही राजस्थान के ऐतिहासिक किलों की छवि दिमाग में उभर आती होगी, और अगर दिल्ली में किसी किले की बात की जाए तो लाल किला सबसे पहले जहन में आता है लेकिन दिल्ली के ही दूसरे किले के बारे में पूछने पर ज्यादातर रीडर्स का जवाब पुराना किला होगा. हा हा हा. और अगर मैं पूछूं आपने फिरोजशाह तुगलक या फिरोजशाह कोटला (Feroz Shah Kotla Fort) किला देखा है तो आप निश्चित ही ना कहेंगे.

आज हम जिस किले की बात करने जा रहे हैं वह है दिल्ली में आईटीओ के पास स्थित फिरोजशाह तुगलक का किला (Feroz Shah Kotla Fort). फिरोजशाह तुगलक किले (Feroz Shah Kotla Fort) का निर्माण फिरोजशाह तुगलक ने सन 1354 में करवाया था. यह किला दिल्ली की सबसे प्राचीन धरोहरों में से है. आईटीओ से आ रहे बहादुरशाह जफर मार्ग पर लाल बत्ती से दाहिने हाथ पर एक रास्ता इस किले की तरफ जाता है. अब बात करते हैं उन वजहों की जिसकी वजह से ये किला आज जाना जाता है.

मैं एक सोमवार की दुपहरी को इस फिरोजशाह कोटला किले (Feroz Shah Kotla Fort) को देखने गया था. यूं कहिए कि ट्रैवल जुनून के लिए एक जुनूनी काम करने गया था. उमस भरी उस गर्मी में मेरा पहला सामना गेट पर खड़े सिक्योरिटी गार्ड से हुआ. मैंने उन्हें अपना परिचय दिया और बात करने लगा. कुछ ही मिनटों में हम दोस्ताना हो चुके थे. सिक्योरिटी गार्ड ने मुझे अंदर की कुछ जानकारी दी और मुझसे पहले वहां पर आए मीडियाकर्मियों के बारे में भी बताया.

 हां, एक दर्द जो उनकी बात में छलका वो ये कि भारतीय पुरात्तव सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित होने के बावजूद इसमें आने वाले ज्यादातर लोग बगैर टिकट लिए अंदर प्रवेश कर जाते हैं. सिक्योरिटी गार्ड के लिए हर किसी से झगड़ पाना संभव नहीं होता है. बगैर टिकट (जो सिर्फ 25 रुपये का है) अंदर आने वाले ज्यादातर लोग जिस वजह से आते हैं, उसका जिक्र हम आगे करेंगे. बहरहाल, हमारा अनुरोध है कि हमारे रीडर्स ऐसा कतई न करें और अगर कोई ऐसा करता दिखा तो उसे भारत की जीडीपी से लेकर इतिहास तक का ज्ञान देकर टिकट अवश्य ले लेने को कहें.


मैंने टिकट लिया और अंदर प्रवेश कर गया. मैं इससे पहले नवंबर 2015  में इस किले में आया था. वो रात्रि का समय था और मैं तुगलक नाटक देखने आया था.  हां, यह नाटक मेरी जिंदगी में अब तक देखे गए सबसे बेहतरीन नाटकों में से है. आगे बढ़ते हैं, अंदर प्रवेश करते ही मैंने कैमरा और माइक निकाल लिया. सिक्योरिटी गार्ड ने गेट पर ही मुझे बताया था कि इस वक्त अंदर न तो लोग होंगे और न ही मौलवी साहब इसलिए मैं बेकार ही कोशिश कर रहा हूं लेकिन इस किले को लेकर मेरे मन में सवालों की झंकार ऐसी उठ रही थी कि मैं खुद को रोक नहीं सका. मैंने सुना था कि इस किले में आत्माओं का वास है और यहां रूहानी ताकतें रहती हैं. यही वजह है कि यहां दहशत के मारे लोग या तो आते नहीं हैं, या जो आते हैं वो अपनी समस्याओं से निदान के लिए यहां पहुंचते हैं.

मैं जैसे ही अंदर गया मुझे दो रास्ते दिखाई दिए, एक दाहिनी ओर लॉन की तरफ जा रहा था, जहां मैं 2015  में नाटक देखने आया था जबकि बाईं तरफ का दूसरा रास्ता किले, पार्क, कुएं और अशोक स्तंभ की तरफ लेकर जाता है. मैं इस दूसरे रास्ते की तरफ बढ़ा. यहां बढ़ते ही मुझे एक दीवार पर कालिख पुती दिखाई दी. संभवतः यहां शुक्रवार या गुरुवार को लोग चिराग, अगरबत्ती जलाकर जिन्नों या रूहों को याद करते होंगे. दीवार इसी वजह से काली पड़ चुकी थी. मैं यहां से आगे बढ़ा. कॉलेज के 4 बच्चों का झुंड मुझे दूर से आता दिखाई दिया. इनके अलावा किले में सिर्फ सुरक्षाकर्मी, एक दिल्ली पुलिस का जवान, माली ही थे.

मैंने थोड़ा नजर को और घुमाया तो दूर घास में 4 शख्स बैठे थे. ये सभी मुझे इस्लाम के जानकार लगे इसलिए मैं दौड़ा दौड़ा उनके पास पहुंचा. मैंने इनसे पूछा- क्या मैं आपसे बात कर सकता हूं. सभी ने विनम्रता से हां कहा और पूछा- बताइए क्या बात करना चाहते हैं? मैंने कहा- आप में से कोई मुझे बता सकता है कि इस किले को लोग भुतहा के तौर पर क्यों जानते हैं और क्या यहां आत्माओं का वास है? मेरे इस सवाल पर 4 में से 3 लोगों ने उन चौथे शख्स की तरफ इशारा कर दिया और कहा कि आपको यही बता सकते हैं. जब मैं चौथे शख्स से मुखातिब हुआ तो उन्होंने मुझे अनुरोध किया कि उनका चेहरा कैमरे पर न दिखाया जाए और न ही उनके नाम की जिक्र किया जाए. मैं तैयार हो गया.

ये जनाब रामपुर से आए एक मौलवी थे. उन्होंने मुझे बताया कि इस्लाम में आत्मा जैसी कोई चीज नहीं होती है. इस्लाम में रूहों का जिक्र है. ये अच्छी रूहों और बुरी रूहों के तौर पर जानी जाती हैं. मैंने पूछा कि लोग यहां पूजा करने आते हैं. अपनी समस्याओं का जिक्र कर चिट्ठियां छोड़ जाते हैं, इसकी क्या वजह है? उन्होंने बताया कि लोग ऐसा मन की शांति के लिए करते हैं. जिस भी जगह जंगल होता है, पुराने किले/खंडहर होते हैं, कुएं होते हैं और वहां 40 दिन तक चिराग न जले, वहां पर जिन्नों का वास हो जाता है. इस जगह पर ये तीनों चीजें हैं और यहां पर इसीलिए जिन्न और रूहें हैं. लोग उन्हीं के आगे मिन्नतें मांगने आते हैं.

इन चार लोगों से अच्छी मुलाकात के बाद मैं आगे चल दिया. आगे रास्ते में दो इमारते थीं. इसके आगे किला खत्म था. और पीछे थोड़ी दूर पर एक बड़ा कुआं था. ये जो दो इमारतें थीं इसमें दाहिनी तरफ वाली इमारत में मुस्लिम समाज के लोग नमाज अदा करते हैं और बाईं तरफ वाली इमारत पिरामिड आकार की है. इसमें कई छोटी छोटी कोठरियां हैं और इसमें सबसे ऊपर अशोक स्तंभ बना हुआ है. मैं पहले इसी इमारत में गया. मैं सीढ़ियों से ऊपर चढ़ता गया और मुझे लोग जिन्न और रूहों की इबादत करते दिखाई देते रहे. जिनकी भी नजर मुझपर पड़ी उन्होंने मुझे लौट जाने को और कैमरा बंद कर देने को कहा. मुझे दीवारों पर वो चिट्ठियां भी दिखाई दी जिसमें सबने अपनी समस्याओं का जिक्र किया था. मैं 

अब मैं इसके ठीक सामने बनी दूसरी इमारत या यूं कहें खंडहर में गया. इसमें मुस्लिम नमाज अदा करते हैं. शुक्रवार को और ईद जैसे खास मौकों पर यहां हजारों की भीड़ पहुंचती है. मुझे अंदर कोई नहीं मिला. मैंने दो सफाईकर्मियों से मौलवी के बारे में पूछा. उन्होंने बताया कि अभी वो यहीं थे, शायद कहीं चले गए. मैं अंदर चला गया. अंदर एक बड़ा सा बरामदा था जिसकी छत नहीं थी. यहां मुझे 2 लोग नमाज अदा करते मिले. नमाज के बाद जब मैंने उनसे बातचीत की तो उन्होंने भी मुझे जिन्नों और रूहों वाली बात सच बताई और कहा कि वह उन्हीं की इबादत करने आए थे. इन दोनों से छोटी सी मुलाकात के बाद मैंने उनसे विदा ली. वो चले गए और मैं भी जूते पहनने लगा. तभी मुझे एक शख्स दिखाई दिया. मैंने सफाईकर्मियों से पूछा कि क्या यही मौलवी हैं. उन्होंने हां कहा तो मैंने उनसे पूछा कि क्या मैं आपसे बात कर सकता हूं. मौलवी ने मेरे विनम्र अनुरोध पर तपाक से चिढ़कर ना कह दिया. ये उन 4 लोगों के मिजाज से बिल्कुल उलट था जिनसे मैं बाहर मिलकर आया था. मैं हैरान था. खैर जूते पहनकर मैं वापस हो लिया.


मैं किले से बाहर निकल रहा था. दो दिन पहले बारिश हुई थी और उमस धरती से आग बरसा रही थी. मैं थका था लेकिन किले की खामोशी मुझे और बोझिल कर रही थी.  लेकिन किले की खामोशी खामोशी नहीं एक वीरानापन थी जो मुझे बता रही थी कि यहां कुछ है जो अलौकिक है. ये वो है जिसे आस्था और विश्वास ही समझ सकता है. यकीनन, मैं इस सन्नाटे को साथ लेकर ये लेख पूरा कर रहा हूं.

फ़िरोज़ शाह कोटला किला के अंदर 


206 में कुतबुद्दीन ऐबक के दिल्ली का सुल्तान बनने से इसके इतिहास में नया चैप्टर जुड़ गया। इससे पहले दिल्ली पर राजपूत राजा का शासन था। मुगलों के आने तक करीब 320 साल तक 5 वंशों ने दिल्ली पर शासन किया। तुगलक वंश (1321-1414) के 11 शासकों ने करीब 100 साल तक राज चलाया। तुगलक वंश के तीसरे शासक फिरोजशाह तुगलक (1351-1388) ने दिल्ली में एक नया शहर बसाया। इसका नाम था-फिरोजाबाद। अभी जो कोटला फिरोजशाह है, यह उसके दुर्ग का काम करता था। इसे कुश्के-फिरोज यानी फिरोज का महल कहा जाता था। ऐसा माना जाता है कि फिरोजाबाद, हौज खास से पीर गायब (हिंदूराव हॉस्पटिल तक) तक फैला हुआ था। मगर, इतनी लंबी दीवार के होने की निशानी नहीं मिली है। इतिहासकार फिरोज़ाबाद को दिल्ली का पांचवां शहर मानते हैं।


अंदर में 



फिलहाल इस दुर्ग के अंदर बची कुछ इमारतों में एक मस्जिद है। इसके साथ ही इसमें अशोक स्तंभ है, जो एक पिरामिड जैसी इमारत पर खड़ा है। किले में एक गोलाकार बावली भी है। इतिहासकारों का मानना है कि कोटला फिरोजशाह में कई महल थे। हालांकि, इनमें से किसी की पहचान नहीं हो पाई है। तीन-चार इमारतों को छोड़ दें तो अंदर कुछ बचा नहीं है। केवल इमारतों के अवशेष हैं।

किले में तीन मंजिला पिरामिडीय इमारत है। यह पत्थरों से बनाई गई है। इसकी हर मंजिल की ऊंचाई कम होती गई है। इमारत की छत पर फिरोजशाह ने अंबाला के टोपरा से स्तंभ लाकर लगवाया था। इस पर अशोक की राजाज्ञा अंकित हैं। यह ब्राह्मी लिपि में है। मौर्य शासक अशोक के इस स्तंभ की ऊंचाई करीब 13 मीटर है। इसे सबसे पहले 1837 में जेम्स प्रिंसेप ने पढ़ा था। ऐसा ही दूसरा स्तंभ फिरोजशाह ने मेरठ के आसपास से मंगवाया था। उसे हिंदूराव अस्पताल के पास लगवाया। इतिहासकारों का कहना है कि इन दोनों स्तंभों को नदी के जरिए लाया गया था।

कोटला फिरोजशाह के अंदर की मस्जिद ऊंचाई वाले आधार पर खड़ी है। इसका नाम जामी मस्जिद है। मस्जिद की एक दीवार ही बची है। तुगलक काल में यह सबसे बड़ी मस्जिद थी। तैमूर ने 1398 में इस मस्जिद में इबादत की थी। यह मस्जिद तैमूर को इतनी अच्छी लगी कि इसकी जैसी ही मस्जिद समरकंद में बनवाई। इतिहासकार मानते हैं कि मस्जिद रॉयल महिलाओं के लिए बनवाई गई थी। किले में मौजूद बावली में आज भी पानी है। इसका इस्तेमाल नहाने और गर्मी से बचने के लिए किया जाता था।


फिरोजशाह तुगलक को इतिहास, शिकार, सिंचाई और वास्तुकला में काफी रुचि थी। उन्होंने कई शिकारगाह जैसे- मालचा महल, भूली भटियारी का महल और पीर गायब बनवाए। कई शहरों की बुनियाद डाली। कुतुब मीनार, सूरज कुंड की मरम्मत करवाई। हौज खास के तालाब की भी मरम्मत फिरोजशाह ने करवाई थी। वहीं उनका मकबरा भी है। फिरोजशाह के शासन में दिल्ली में कई मस्जिदें भी बनाई गईं।



हवा महल



हवा महल पिरामिड के आकार का महल है जिसे निजी कमरों से जोड़ा गया था। महल के फर्श एक गलियारे के माध्यम से निजी कमरों से जुड़े हुए हैं। इमारत में तीन मंजिला हैं और कोने पर एक सीढ़ी है जो इमारत की छत पर जाती है।

अशोक स्तंभ


अशोक स्तंभ को जामी मस्जिद के उत्तर में रखा गया है। मौर्य साम्राज्य के राजा अशोक ने अम्बाला के टोपरा में 273 और 236 ईसा पूर्व के बीच स्तंभ का निर्माण किया था। फ़िरोज़ शाह तुगलक ने अंबाला से स्तंभ लाया और इसे किले में स्थापित किया। खंभे की ऊंचाई 13 मी थी। स्तंभ को सफलतापूर्वक स्थापित करने के लिए, तीन मंजिला की एक पिरामिड संरचना का निर्माण किया गया था।

स्तंभ के ऊपर कलश के साथ काले और सफेद पत्थरों का उपयोग करके पिरामिड संरचना का निर्माण किया गया था। स्तंभ को खूबसूरती से सजाया गया था और इसका नाम मीनार-ए-ज़रीन रखा गया था। कुछ शिलालेख अशोकन स्तंभ में पाए जा सकते हैं जो प्राकृत और ब्राह्मी लिपियों में लिखे गए थे। बुद्ध की दस आज्ञाएँ भी हैं जिनके कारण मौर्य काल में बौद्ध धर्म का प्रसार हुआ। स्तंभ को देखने का सबसे अच्छा समय उस दिन के दौरान होता है जब सूर्य की किरणें सीधे उस पर पड़ती हैं और यह सोने की तरह चमकता है।

क्या वाकई जिन्न रहते हैं इस किले में?

लोगों का ऐसा विश्वास है कि कोटला फिरोजशाह में जिन्न रहते हैं और उनसे जो भी मांगा जाए वह मिल जाता है। हर गुरुवारा को किले में बड़ी संख्या में लोग आते हैं। वे अगरबत्ती, दीये, दूध और कई तरह के अनाज लेकर आते हैं। हालांकि इस किले के संरक्षण की जिम्मेदारी निभा रहा आर्कियॉलजिकल सर्वे ऑफ इंडिया, इसे लोगों का अंधविश्वास मानता है। साथ ही लोगों से इस ऐतिहासिक इमारत को नुकसान न पहुंचाने की अपील भी करता रहता है। उसका मानना है कि अंधविश्वास की वजह से इमारत को बहुत नुकसान पहुंचता है। अगरबत्ती और दीये के धुएं से इमारत गंदी होती है। साथ ही अनाज, फल और दूध जैसी चीजें चढ़ाने से यहां चूहों का आतंक बढ़ता है। चूहें इमारत की नींव कमजोर करते हैं। लोगों के इस अंधविश्वास के कारण इमारत को पिछले 40-50 साल से नुकसान हो रहा है।


खासियत

कोटला फोर्ट दिल्ली के सबसे पुराने किलों में से एक है। इस किले का आर्किटेक्चर सैलानियों को आकर्षित करता है। इस किले का निर्माण मूल रूप से एक अनियमित बहुभुज आकार में किया गया था। मलिक गाजी और अब्दुल हक्क द्वारा इस किले को डिजाइन किया गया था


ऐसे पहुंचे

फिरोज शाह कोटला का किला दिल्ली के विक्रम नगर की वाल्मिकी बस्ती में स्थित है। यहां के लिए सबसे नजदीकी मेट्रो स्टेशन प्रगति मैदान है। बस और ऑटो से भी यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है।


घूमने का समय

कोटाल फोर्ट को आप सुबह 8:30 से शाम 7 बजे तक घूम सकते हैं। इस किले को आप 1 से 2 घंटे में बहुत आराम से घूम सकते हैं और यहां वक्त बिता सकते हैं।

टिकट

किले में घूमने के लिए टिकट लेना होता है। भारतीय सैलानियों के लिए इस किले में एंट्री फीस मात्र 25 रुपए है तो विदेशी टूरिस्ट्स के लिए 100 रुपए

आस-पास का नजारा

कोटला किले के आस-पास और भी कई हिस्टोरिकल मॉन्यूमेंट्स हैं, जिन्हें आप घूम सकते हैं। इनमें हुमायू का मकबरा, लाल किला, जामा मस्जिद, इंडिया गेट और कुतुब मीनार जैसी दिल्ली की खास धरोहरें शामिल हैं।







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